Keep Smiling

Keep Smiling

KEEP SMILING

मुझे याद है जब हम छोटे थे, सुन्दर-सुन्दर बातों के छोटे-छोटे लेबिल को लोग अपने दरवाजे पर, चौखट पर चिपकाते थे । भले ही कोई उस पर अमल न करे ये दूसरी बात थी। लेकिन अच्छी-अच्छी बातो वाला लेबल खरीदना और उस लेबल को अपने आस-पास चस्पाना, समाज मे अपने अच्छे होने की निशानी समझी जाती थी । लोग भले ही अच्छे हो या न हो उनकी बातें अच्छी होने चाहिए। क्योंकि बाबा तुलसी का “भय बिनु होहि न प्रीति... “ का भय इतना था कि लोग अंदर से भले ही कुछ और हो.. लेकिन बाहर से अच्छा बनना ही पड़ता है। तो लोग अपने-आप को तरह-तरह से खुद को अच्छा साबित करने में लगे रहते थे। इस तरह के लेबल चस्पाना भी उन उपायों में से एक था।

उन सभी लेबल में जो सबसे आसान और सुन्दर बात थी “मुस्कुराते रहो” और इसे अंग्रेजी में भी “KEEP SMILING” का लेबल लगाना काफी प्रचलित था। मैने भी इसे अपने दरवाजे पर चस्पाया था। तब हम ये सोचा करते थे कि इसमें कौन सी नई बात है “मुस्कुराते रहो”। लेकिन आज जब हम अपने जीवन के दूसरे दौर मे है, खुद और आस-पास के लोगो के विचारों को देखकर समझ में आता है कि वो “मुस्कुराते रहो” व “KEEP SMILING” वाला लेबल कितना प्रासंगिक था, कितना अर्थपूर्ण था और आज भी है। आज ये छोटी और आसान सी बात कितनी कठिन हो गई है। मुस्कुराहट हर चेहरे से कैसे गायब हो रही है। हाँ... बनावटी मुस्कुराहटों का चलन अवश्य ही जोरों पर है। क्योंकि अब भागते-दौड़ते और अपने जिम्मेदारियों के बोझ तले दब कर जो हँस नही पाते उनको ही समझदार और जिम्मेदार कहा जाता है। हँसने और मुस्कुराने वालों को लोग नासमझ और “अभी बच्चे हो, तुम्हें भी धीरे-धीरे समझ में आ जाएगा” कहकर उसे अनुत्तरित कर देते है। बहुत मुश्किल से इक्के-दुक्के ही ऐसे लोग मिल पाते है जो अपने जीवन की आपा-धापी से जीतकर मुस्कुरा पाते है ।

जीवन जीना भी एक कला है, और इस जीवन में मुस्कुराना और भी एक विशिष्ट कला। चाहे सुख हो या दुख, जैसा भी पल हो, हर पल में जो मुस्कुराता रहे, जिसे अपनी जिन्दगी से कोई शिकवा न हो, वो महान है, जिस पर इस जगत के किसी माया का कोई प्रभाव न पड़ा हो, और वो मस्ती में अपनी जिन्दगी में आगे बढ़ता हो, वही जीता है। ऐसा नही है कि ये सिर्फ मै ही जानता हूँ, ये बातें आम है, सभी जानते है, इसमें कुछ नया नही है, बहुत पुरानी बातें है ये लेकिन पुरानी भी इतनी हो गई है कि इस पर धूल जम गया है।

आज अनावश्यक महत्वाकांक्षाओं को आवश्यक बनाकर उसे पाने के पीछे भाग कर अपना जीवन नरक बनाया जाता है। अपनी मुस्कुराहट को अपने एक मंजिल मकान में दबाकर पड़ोसी के तीन मंज़िल बन रहे मकानों के चक्कर में अपनी हंसती-खेलती जिन्दगी में अपने ही हाथों जहर घोल लेते है। अच्छी-खासी मजे मे चल रही जिंदगी में जहर तब भी घोल लेते है जब पड़ोसी के यहाँ एक नई कार आती है तो अपनी मोटर-साइकिल अच्छी नही लगती। हैरानी की बात है, समझ नही आता कि लोग क्या समझते है जिंदगी को, क्या चाहते है जिंदगी में – मुस्कुरा कर जीना या जान-बूझकर खुद को खाई में ढकेलना। लोग ऐसा समझते है कि जब तक हमारा मकान पड़ोसी के मकान से ऊँचा नही, पड़ोसी की कार से महँगी कार नही, पड़ोसी के बच्चे जिस स्कूल में पढते है उससे ज्यादा महँगी स्कूल में हमारे बच्चे पढते है कि नही, तो इसी तरह से लोगो ने कुछ ऐसे मानक तैयार कर लिये है दिमाग में, जिससे उनकी खुशी, मुस्कुराहट पड़ोसी की दीवारो के पीछे, कार के नीचे और न जाने किस-किस चीज के नीचे दब गई है... अब मुस्कुराहट आये भी तो कैसे....? जब तक ये...... तब तक वो..... उफ्फ ....। क्या हालत हो गई है।

मुझे लगता है कि आज जरूरत है वही “मुस्कुराते रहो” और “KEEP SMILING” की, जिन्दगी में उन छोटी-छोटी बातों को व्यवहार में लाने की जिसे हम कभी दरवाजों पर, चौखटो पर, साइकिलो पर गाड़ियों पर... चस्पाया करते थे, जरुरत है व्यर्थ की घुटती जिंदगी को खुले आसमान के नीचे मुस्कुराने का मौका देने की, जरूरत है उन छोटे-छोटे मुस्कुराहटों को इकट्ठा करने की, और अपने जिंदगी का आनन्द लेने की।


जीवन में हर तरह के एहसास मन से ही तो आते है, तो अगर हम मन पर आसानी से समझ कर विजय पा ले तो हम हर पल मुस्कुरा सकते है। इतना ख्याल रहे कि मन पर विजय पाने के लिए मन से जबरदस्ती नही हो, अन्यथा मन विकृत हो सकता है। सब कुछ मन पर ही निर्भर करता है, कि क्या हमारी आवश्यकता है, और क्या नहीं, क्या पाना है और क्या नही।

हम सबने सुना है, एक बहुत ही प्रचलित भजन में कवि ने भी कहा है –

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सुख की कलियाँ दुख के काँटे
मन सब का आधार
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मन उजियारा जब-जब फैले
जग उजियारा होए
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आपस के प्रेम, भाईचारे सब कुछ विलीन होते जा रहे है। किसी के दो गज जमीन हथिया कर या लेन-देन में बेईमानी करके एक-दूसरे से आगे से निकलना चाहते है, दूसरे की टाँग खीचकर उसे पीछे करना चाहते है। इन सब में प्रेम, रिश्ते, भाईचारे और कई तरह के शिष्टाचार पिसते जा रहे है। छोटी-छोटी बातों पर लोग एक-दूसरे के जान लेने पर उतारू हो जाते है, और ले भी लेते है, बड़ी आसानी से। आज इंसान का जीवन बड़ा ही सस्ता हो गया है। सच्ची घटना है - कुछ ही दिन हुए है मेरे ऑफिस के सामने दिन-दहाड़े एक दुकान वाले को गोली मार दी, पता चला कि घर के कुछ जमीनी मामले थे। क्या मिलता है थोड़े जमीन ज्यादा रखकर।

संसार मे जो कुछ भी प्रकृति का है वो हर तरह से किसी-न-किसी रूप से उपयोगी है चाहे वो कोई पेड़-पौधे हो या जंतु हो, उसके मरने के बाद भी उसका उपयोग होता है। लेकिन एक मनुष्य ही है जिसका कोई उपयोग नही इसके मरने के बाद, सब मिट्टी हो जाता है। फिर भी वो थोड़े से पाने के लिए अपनी इंसानियत पर बड़ी आसानी से दाग लगा जाता है, बाद में कुछ भी तो नही मिलता उसे, कुछ भी तो नही होता उसका, फिर ये व्यभिचार क्यों, अपनो का खून कर, दो गज जमीन लेकर क्या पाना चाहता है इंसान, इन सब के जड़ में जो बातें है वो सिर्फ मुस्कुराहट की कमी और अपने मन से दूर होकर जीना है।

मन बड़ा ही निर्मल है, कोमल है, स्वच्छ है, सब के हित की सोचने वाला है, लेकिन इस मनुष्य ने बाहर के निरर्थक महत्वाकांक्षाओं के बोझ से इस निर्मल मन को कुचल दिया है। अब मनुष्य में मनुष्यता कम, हैवानियत ज्यादा और जल्द ही दिखाई दे जाती है, जिसका परिणाम है कि समाज आज विकृत होता जा रहा है। समाज व्यभिचार, भ्रष्टाचार, अत्याचार और बलात्कार से भर गया है। मन की मुस्कुराहटें समाप्त हो गई है। खरीदनें और बिकने वाली मुस्कुराहटें हर चेहरे पर है, जिससे सही मनुष्य का आकलन करना मुश्किल हो गया है। अगर इस समाज को सही मनुष्यों से सजाना है तो हर चेहरे पर सच्ची मुस्कुराहटें पैदा करनी ही होंगी। मन पर पुती कालिखों को हमें साफ कर उजाला फैलाना होगा ताकि पूरा जगत रोशनी से भर जाए।

आज हमें इस जीवन के वृक्ष को खुले विचारों से जीने के लिए स्वतंत्र करना चाहिए। ताकि हम इस जीवन के बहुआयामी तथ्यों को, रूपों को अनुभव कर सके, जान सके। इस प्रकृति में बहुत सी ऐसी बात है जिसे अभी तक अनुभव नही किया जा सका है, नही जाना जा सका है, जिसके बारे में हम अभी तक अबूझ है, जिसके बारे में मनगढंत कहानियाँ गढी गई है, और हम उसी को मानते हुए चले आ रहे है। जरूरत है ऐसी बातों से पर्दा हटाने की, सच्चाई जानने की, प्रकृति के उन रहस्यों को अंधेरे से उजाले में लाने की। और ऐसा करने के लिए खुले दिमाग का होना जरूरी है न कि छोटी-मोटी बातों में खुद को व्यर्थ ही फँसा कर, उलझाकर, तनाव से ग्रसित जिंदगी में जीना । इसलिए “KEEP SMILING”

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