काव्य

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जुस्तजू

जिसे चाहो नहीं जमाने में, मिल जाती है जुस्तजू हो जिसकी अक्सर, मिला नही करते ।

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लाचार

लाचार - आ गया था गर्भ से बीज मैं बाहर अब हंस रहे थे सब यहाँ बस रो रहा था मैं डर रहा था और सहमा हुआ था मैं दृश्य लीला मानवों का गर्भ से देखा था जो

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बीज का असमंजस

बीज का असमंजस हर तरफ है धुन्ध धुंध,कहूँ भी कुछ तो क्या कहूँ एक जाल से घिरा हुआ, कर-पग भी है बँधा हुआ।

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संवेदना

संवेदना मन की विरह है, मन की कुछ है वेदना। झकझोरती रहती है, करती है आन्दोलित, बतलाउँ किसे, समझाउँ किसे, मन में जो है संवेदना ।

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मजहबी लुटेरे

हो क्या रहा है आज यहाँ मज़हब की चारदीवारी में इंसा इंसा के भूखे है कभी रहते थे आपसदारी में

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