जुस्तजू
जिसे चाहो नहीं जमाने में, मिल जाती है जुस्तजू हो जिसकी अक्सर, मिला नही करते ।
जिसे चाहो नहीं जमाने में, मिल जाती है जुस्तजू हो जिसकी अक्सर, मिला नही करते ।
लाचार - आ गया था गर्भ से बीज मैं बाहर अब हंस रहे थे सब यहाँ बस रो रहा था मैं डर रहा था और सहमा हुआ था मैं दृश्य लीला मानवों का गर्भ से देखा था जो
बीज का असमंजस हर तरफ है धुन्ध धुंध,कहूँ भी कुछ तो क्या कहूँ एक जाल से घिरा हुआ, कर-पग भी है बँधा हुआ।
संवेदना मन की विरह है, मन की कुछ है वेदना। झकझोरती रहती है, करती है आन्दोलित, बतलाउँ किसे, समझाउँ किसे, मन में जो है संवेदना ।
ढूँढता हूँ खुद को मैं यहाँ-वहाँ बिखर गया हूँ टूटकर जहाँ-तहाँ, चोट की है दिल पे उसने दोस्तों बदन पे ज़ख्म है मगर जहाँ-तहाँ
हो क्या रहा है आज यहाँ मज़हब की चारदीवारी में इंसा इंसा के भूखे है कभी रहते थे आपसदारी में
बुनते सपने सबकी आँखों में देखा है सच होते है कितने लाखों में देखा है, गिर जाते है सूखके पत्ते मौसम से जीने की ज़िद हर कलियों में देखा है