जरा धीरे चलना
काँटों भरी है जिन्दगी, जरा धीरे चलना
ढ़लने लगी है शाम अब, जरा धीरे चलना
पी लिया है फ़लसफ़ा, हर ज़ाम में उसने
बहकने लगे है अब कदम, जरा धीरे चलना
जा रहे हो ढ़ूँढ़ने, इकतारा लेकर
वीरान है उसकी गली, जरा धीरे चलना
मज़हब यहाँ पर बन चुके है, अब खिलौने
पिचकारियों से है रौंदते, जरा धीरे चलना
छाई हुई है सूबे मे, एक फ़रेब-ए-हलचल
कुछ घोंसलों में हैं परिन्दे, जरा धीरे चलना
फूस का घर है मेरा, कारवां-ए-पील उनका
जाके उनसे कोई कह दे, जरा धीरे चलना
होश इतना भी रहे, कि खुद उठ सको
इतना समझकर ऐ ‘शजर’, जरा धीरे चलना

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