आइए, आज आपको उन चार लोगों से मिलवाते हैं, जिनके डर से अक्सर लोग अपनी जिंदगी के अहम फैसले नहीं कर पाते या टालते रहते हैं!
हमारे देश में दो चीजों का पता लगाना बहुत मुश्किल है। पहली, सरकारी दफ्तर में फाइल आखिर किस मेज पर जाकर सो गई है और दूसरी, ये चार लोग आखिर हैं कौन, जिनके डर से आदमी अपनी जिंदगी के फैसले भी खुद नहीं ले पाता!
आपने किसी न किसी को कहते जरूर सुना होगा—"अरे भाई, कुछ तो समाज का भी ख्याल करो! चार लोग क्या कहेंगे?"
हैरानी की बात यह है कि इन चार लोगों को आज तक किसी ने ठीक से देखा नहीं, लेकिन इनका खौफ पूरे समाज में फैला हुआ है। भूत-प्रेत भी रात में डराते हैं, मगर ये चार लोग सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक आदमी के दिमाग में घूमते रहते हैं।
हमने सोचा, आखिर इनका भी कुछ पता लगाया जाए। देश में इतने बड़े-बड़े खोजी पत्रकार हैं, वैज्ञानिक हैं, जासूस हैं, लेकिन आज तक कोई यह नहीं बता पाया कि ये चार लोग हैं कौन! आइये हम अपने ही एक पड़ोसी के साथ होने वाली एक घटना पर नजर डालते है और हो सकता है आपको उन चार लोगों का पता भी इसी बहाने मिल जाए -
एक बार की बात है। हमारे मोहल्ले में एक सज्जन रहते थे—नाम था घनश्याम बाबू। सीधे-सादे आदमी थे। अपनी नौकरी करते, घर आते, बच्चों के साथ समय बिताते और कभी-कभी रविवार को अपनी पसंद की जलेबी भी खा लेते थे। कुल मिलाकर जिंदगी ठीक चल रही थी।
एक दिन उन्होंने तय किया कि अब नौकरी छोड़कर अपना छोटा-सा कारोबार शुरू करेंगे। कई साल से मन में इच्छा थी। हिसाब-किताब किया, थोड़ी बचत जोड़ी और पत्नी से बोले, "सुनो, इस बार मन की करते हैं। जिंदगी भर दूसरों के लिए काम किया, अब अपने लिए कुछ करते हैं।"
पत्नी ने भी हिम्मत बढ़ाई। बोलीं, "अच्छा विचार है। कोशिश तो करनी चाहिए।"
घनश्याम बाबू अगले दिन खुशी-खुशी अपने मित्र को यह खबर सुनाने उनके घर पहुँचे। वहाँ मित्र ने चाय मंगवाई और दोनो चाय की चुस्की लेने लगे। बातों बातों मे जैसे ही घनश्याम बाबू ने अपने मित्र से अपना विचार बताया, मित्र ने चाय का कप नीचे रखा, चश्मा ठीक किया और ऐसा चेहरा बनाया, जैसे घनश्याम बाबू कारोबार नहीं, देश की अर्थव्यवस्था डुबोने जा रहे हों।
बोले, "अरे भाई! नौकरी छोड़ दोगे? और चार लोग क्या कहेंगे?"
बस! इतना सुनना था कि घनश्याम बाबू की सारी हिम्मत चाय की भाप के साथ उड़ गई।
उन्होंने पूछा, "ये चार लोग कौन हैं?"
सो घनश्याम बाबू ने कमर कसी और निकल पड़े उन चार महानुभावों की तलाश में।
पहली मुलाकात: शर्मा जी, मोहल्ला खुफिया विभाग के प्रमुख
हमारे मोहल्ले में शर्मा जी रहते हैं। उन्हें अपने घर की छत पर पानी की टंकी कब साफ हुई थी, यह याद न हो, लेकिन सामने वाले घर में कौन-सा मेहमान कितने बजे आया था, इसकी जानकारी उन्हें मिनट और सेकंड सहित मिल सकती है।
उनकी नजर से मोहल्ले में कुछ नहीं बचता। किसने नई गाड़ी खरीदी, किसकी बेटी की नौकरी लगी, किसके बेटे ने नौकरी छोड़ी और किसके घर में कल रात सब्जी में आलू बना था या पनीर — शर्मा जी को सब पता रहता है।
घनश्याम बाबू ने उनसे पूछा, “शर्मा जी, जरा बताइए, मैं नौकरी छोड़कर अपना कारोबार शुरू करूँ तो लोग क्या कहेंगे?”
शर्मा जी ने तुरंत चश्मा ठीक किया और बोले, “देखिए, लोग तो कहेंगे कि नौकरी नहीं संभली, इसलिए कारोबार करने चले हैं!”
घनश्याम बाबू ने पूछा, "और कारोबार चल निकला तो?"
शर्मा जी बोले, "तब कहेंगे कि जरूर किसी बड़े आदमी से संपर्क होगा!"
"और अगर कारोबार नहीं चला?"
"अरे भाई, हम तो पहले से कह रहे थे!"
घनश्याम बाबू कुछ देर उन्हें देखते रहे। फिर बोले, “शर्मा जी, आप भविष्य भी बताते हैं?”
शर्मा जी गर्व से बोले, "बिल्कुल! हम तो आदमी को देखकर ही बता देते हैं कि आगे क्या होगा।"
घनश्याम बाबू ने पूछा, "तो अपने बारे में भी बता दीजिए। आप अगले दस साल में क्या करने वाले हैं?"
शर्मा जी ने खाँसते हुए कहा, "अरे, हमसे क्या पूछते हो! अपनी बात करो।"
घनश्याम बाबू समझ गए कि दूसरों का भविष्य बताने वाले महापुरुष अपने भविष्य पर चर्चा होते ही वर्तमान में लौट आते हैं।
दूसरी मुलाकात: वर्मा जी, मुफ्त सलाह वितरण मंत्रालय
अब हमारी तलाश पहुँची वर्मा जी तक। वर्मा जी का अपना कोई कारोबार नहीं था, लेकिन कारोबार कैसे करना चाहिए, इस पर उनका ज्ञान किसी प्रबंधन संस्थान से कम नहीं था।
नौकरी कीजिए तो कहते, "अपना काम शुरू करो।"
अपना काम शुरू कीजिए तो कहते, "नौकरी छोड़ना बेवकूफी है।"
शादी कीजिए तो कहते, "इतनी जल्दी क्या थी?"
शादी न कीजिए तो कहते, "उम्र निकल रही है, अब कब करोगे?"
यानी इनके हिसाब से आदमी जो भी कर ले, गलती उसी की निकलनी है।
घनश्याम बाबू ने पूछा, "वर्मा जी, मैं नौकरी छोड़कर कारोबार करना चाहता हूँ। क्या सलाह देंगे?"
वर्मा जी ने तुरंत कहा, "नौकरी बिल्कुल मत छोड़ना। आजकल नौकरी मिलती कहाँ है?"
"लेकिन नौकरी के साथ कारोबार नहीं संभला तो?"
"तो कारोबार मत करना!”
“और कारोबार नहीं किया तो जिंदगी भर नौकरी ही करनी पड़ेगी।”
वर्मा जी बोले, “तो क्या हुआ? नौकरी में सुरक्षा होती है!”
घनश्याम बाबू ने पूछा, “आपने कभी कारोबार किया है?”
वर्मा जी ने छाती चौड़ी करते हुए कहा, “नहीं, लेकिन मेरे एक रिश्तेदार के साले ने किया था। बहुत नुकसान हुआ था!”
घनश्याम बाबू बोले, “अच्छा! तो कारोबार का पूरा अनुभव रिश्तेदार के साले से मिला है?”
वर्मा जी नाराज हो गए। “तुम मेरी सलाह का मजाक उड़ा रहे हो!”
इतने में अंदर से वर्मा जी की पत्नी की आवाज आई, “सुनते हो! सुबह से ही आलू लाने के लिए कह रही हूँ। पहले आलू तो ले आओ, फिर दूसरों को जिंदगी की दिशा दिखाना!”
वर्मा जी ने घनश्याम बाबू की तरफ देखा और बोले, “घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ भी बहुत होती हैं!”
घनश्याम बाबू ने मन ही मन कहा—वाह रे सलाह मंत्रालय! दूसरों का भविष्य बनाने का समय है, लेकिन घर में आलू पहुँचाने का बजट और व्यवस्था दोनों लंबित हैं!
तीसरी मुलाकात: गुप्ता जी, इज्जत बचाओ समिति के अध्यक्ष
गुप्ता जी की जिंदगी का एक ही उद्देश्य था—लोगों को ऐसा लगना चाहिए कि सब कुछ शानदार चल रहा है, चाहे घर में पंखा बंद हो और जेब में हवा चल रही हो।
गाड़ी किस्तों पर खरीदी थी, लेकिन परिचय ऐसा देते थे जैसे कंपनी ने उन्हें सम्मान में भेंट की हो। घर में मेहमान आने वाले हों तो सोफे पर नया कवर चढ़ जाता था, ताकि किसी को पता न चले कि पुराना सोफा अब इतिहास का विषय बन चुका है।
घनश्याम बाबू ने अपनी योजना बताई।
गुप्ता जी ने गंभीर होकर कहा, “भाई, इज्जत बहुत मुश्किल से बनती है। मान लो कारोबार नहीं चला तो लोग क्या कहेंगे?”
घनश्याम बाबू ने पूछा, “और कारोबार चल गया तो?”
“तो बहुत अच्छी बात है!”
“लेकिन तब भी लोग कुछ कहेंगे?”
गुप्ता जी बोले, “अरे, खुशी में लोग तो कुछ भी कह देते हैं!”
घनश्याम बाबू ने सिर हिलाया। “समझ गया। असफलता में लोग मेरी गलती निकालेंगे और सफलता में मेरी किस्मत।”
गुप्ता जी बोले, “तुम बात को समझते नहीं हो। समाज में रहना है तो समाज की प्रतिष्ठा का भी ख्याल रखना पड़ता है।”
घनश्याम बाबू ने पूछा, “गुप्ता जी, अगर कारोबार में थोड़ा पैसा कम पड़ जाए तो मदद कर देंगे?”
गुप्ता जी ने तुरंत कहा, “अरे, अपने ही आदमी हो! कैसी बात कर रहे हो?”
“तो दस हजार रुपये उधार दे दीजिए।”
गुप्ता जी ने पहले घड़ी देखी, फिर मोबाइल देखा, फिर अचानक दरवाजे की तरफ देखने लगे।
“अरे! मुझे अभी याद आया, घर पर जरूरी काम है। पैसे की बात आराम से बैठकर करेंगे।”
घनश्याम बाबू बोले, “गुप्ता जी, आप बैठकर पैसे की बात करते हैं या पैसे को बैठाकर खुद चले जाते हैं?”
गुप्ता जी ने उनकी बात अनसुनी कर दी।
अब घनश्याम बाबू को समझ आने लगा था कि समाज में इज्जत बचाने की जिम्मेदारी सबकी होती है, लेकिन मदद करने की बारी आए तो हर कोई अपने-अपने घर का रास्ता पकड़ लेता है।
चौथी मुलाकात: मिश्रा जी, अदृश्य न्यायालय के माननीय न्यायाधीश
आखिरी उम्मीद मिश्रा जी से थी। वे हर मामले में फैसला सुनाने के लिए प्रसिद्ध थे। उनके न्यायालय में न सबूत की जरूरत थी, न गवाह की और न ही आरोपी की बात सुनने की। फैसला पहले तैयार रहता था, बस घटना के हिसाब से कारण जोड़ दिए जाते थे।
घनश्याम बाबू ने अपनी पूरी कहानी सुनाई।
मिश्रा जी ने गंभीर आवाज में कहा, “देखो बेटा, समाज में रहना है तो समाज के हिसाब से चलना पड़ेगा।”
घनश्याम बाबू ने पूछा, “मिश्रा जी, कारोबार में नुकसान हुआ तो क्या समाज मेरा घाटा भर देगा?”
“नहीं, लेकिन…”
“बच्चों की फीस देगा?”
“नहीं, मगर…”
“बुढ़ापे में मेरा खर्च उठाएगा?”
मिश्रा जी ने कुर्सी पर करवट बदली। “देखो, हर बात को पैसे से मत जोड़ो। समाज की भी कुछ मर्यादा होती है!”
घनश्याम बाबू ने हाथ जोड़कर कहा, “मिश्रा जी, मेरी मर्यादा तो समझ में आ गई। अब उन चार लोगों की मर्यादा भी बता दीजिए, जो मेरे फैसले से इतने परेशान हैं। जोखिम मैं उठाऊँ, मेहनत मैं करूँ, नुकसान मेरा हो और फैसला सुनाने का अधिकार किसी और के पास रहे—यह कैसा न्याय है?”
मिश्रा जी बोले, “तुम आजकल कुछ ज्यादा सवाल पूछने लगे हो!”
घनश्याम बाबू मुस्कुराए। “क्या करूँ मिश्रा जी, जिंदगी का मामला है। बिना सवाल पूछे फैसला कर लिया तो बाद में कहीं आप ही न कह दें—हमने तो पहले ही मना किया था!”
इस बार मिश्रा जी भी चुप हो गए। उन्हें शायद पहली बार लगा कि बिना जिम्मेदारी उठाए फैसला सुनाना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल है उस फैसले का हिसाब देना।
आखिरकार खुला उन चार लोगों का राज!
शाम को घनश्याम बाबू घर लौटे। पत्नी ने पूछा, “मिल आए अपने चार लोगों से?”
घनश्याम बाबू बोले, “हाँ, मिल आया। एक को मोहल्ले की खबर चाहिए, दूसरे को मुफ्त सलाह बाँटनी है, तीसरे को इज्जत बचानी है और चौथे को फैसला सुनाना है। लेकिन जब मदद माँगी तो चारों ऐसे गायब हुए, जैसे बिजली का बिल देखते ही पूरा परिवार कमरे से बाहर निकल जाता है!”
पत्नी हँस पड़ीं। बोलीं, “तो अब क्या करोगे?”
घनश्याम बाबू ने कहा, “अब कारोबार शुरू करूँगा। पहले हिसाब लगाऊँगा, जोखिम समझूँगा, जरूरी सलाह लूँगा और फिर फैसला खुद करूँगा। जिंदगी मेरी है, तो उसके फैसले का रिमोट भी मेरे पास ही रहना चाहिए।”
कुछ महीनों बाद उनका कारोबार चल निकला।
अब वही शर्मा जी कह रहे थे, “हमें तो पहले से पता था कि घनश्याम में बहुत दम है!”
वर्मा जी बोले, “मैंने ही तो समझाया था कि मेहनत करनी चाहिए!”
गुप्ता जी बोले, “अपने आदमी को आगे बढ़ते देखकर बहुत खुशी होती है!”
और मिश्रा जी ने अंतिम फैसला सुनाया, “देखा! अनुभवी लोगों की सलाह कभी बेकार नहीं जाती!”
घनश्याम बाबू ने चारों को देखा और मुस्कुराकर कहा, “आप सबका बहुत धन्यवाद। अब एक छोटा-सा काम और कर दीजिए।”
चारों एक साथ बोले, “बताइए, बताइए!”
घनश्याम बाबू बोले, “कल को कारोबार में घाटा हो जाए तो आप चारों मिलकर नुकसान बाँट लीजिएगा। आखिर सफलता में आपका योगदान है, तो असफलता में भी थोड़ी साझेदारी बनती है!”
शर्मा जी को अचानक पड़ोस की एक जरूरी खबर याद आ गई। वर्मा जी को आलू लेने जाना था। गुप्ता जी की प्रतिष्ठा खतरे में पड़ गई और मिश्रा जी ने घोषणा कर दी कि यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
घनश्याम बाबू हँस पड़े।
उन्हें अब समझ आ गया था कि ये चार लोग कोई चार निश्चित व्यक्ति नहीं हैं। ये तो हमारे समाज में जगह-जगह मिल जाने वाले ऐसे किरदार हैं, जो दूसरों की जिंदगी में मुफ्त की भागीदारी चाहते हैं—बिना निवेश, बिना जोखिम और बिना जिम्मेदारी!
और कभी-कभी तो ये चार लोग हमारे अपने दिमाग में ही बैठ जाते हैं। हम कोई कदम उठाने से पहले खुद ही अपने खिलाफ गवाह खड़े कर लेते हैं और फैसला भी खुद ही सुना देते हैं—“नहीं भाई, रहने दो। लोग क्या कहेंगे?”
एक सवाल उन चार लोगों से भी
यहाँ यह कहना नहीं है कि दूसरों की सलाह मत सुनिए। परिवार के अनुभव, दोस्तों की चिंता और शुभचिंतकों की बात कई बार हमें बड़ी गलती से बचा सकती है। लेकिन सलाह और दखल में फर्क होता है। चिंता और नियंत्रण में फर्क होता है।
समस्या उन लोगों से नहीं है जो हमारी भलाई चाहते हैं। समस्या उस डर से है, जिसके कारण हम अपने सही फैसले लेने से पहले ही हार मान लेते हैं।
इसलिए अगली बार कोई कहे, “चार लोग क्या कहेंगे?”, तो उससे बस इतना पूछिएगा—
“भाई साहब, उन चारों के नाम-पते तो बताइए। और हाँ, चाय के साथ बिल भी उन्हीं से भरवा दीजिएगा। जिंदगी भर हमारी जिंदगी का हिसाब लगाते रहे हैं, आज थोड़ी जिम्मेदारी भी उठा लें!”
क्योंकि जनाब, दुनिया की सबसे बड़ी विडंबना यही है—जब तक आप संघर्ष कर रहे होते हैं, चार लोग आपकी गलतियाँ गिनते हैं; जब सफल हो जाते हैं, वही चार लोग आपकी सफलता में अपना योगदान गिनाने लगते हैं।
और अगर असफल हो गए, तो चारों का एक ही बयान आता है—
“हमने तो पहले ही कहा था!”
बस, इन चार लोगों को पहचानिए। इनकी सलाह में काम की बात हो तो जरूर लीजिए, लेकिन अपनी जिंदगी की चाबी इनके हाथ में मत दीजिए।
आखिर जिंदगी आपकी है। इसे चलाने का ठेका पूरे मोहल्ले को तो नहीं दिया है!

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