काव्य

कभी कुछ कर के देखो

कभी कुछ कर के देखो
My post published in Dainik Jagran Daily Newspaper

कभी कुछ कर के देखो

धूल दर्पण से कभी हटा कर देखो
नक़ाब चेहरे से कभी हटा कर देखो

तिनकों के घोसलें में भी बनते है रिश्तें
अपने रिश्तों को कभी निभा कर देखो

गैर की दीवार में दरार न तलाशो 
अपना एक घर कभी बना कर देखो

अज़ीज होते है सबके अपने ख्वाब 
अपने ख्वाबों को कभी सजा कर देखो

बैठ कर गिनते हो उनके गिले-शिकवे
मोहब्बत को मोहब्बत से कभी बुला कर देखो

बाज़ार में आए है चंद नए सिक्के
वक़्त की आग में इन्हें कभी तपा कर देखो

अपने आरज़ू के मुकम्मल को जिंदगी कहते हो
किसी रोते चेहरे को कभी हंसा कर देखो


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Bhagwan Babu · भगवान बाबु

Hindi poetry, ghazals, songs and essays, along with technology tutorials. Writing published in Dainik Jagran.

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