सुर, संगीत, थाट और राग क्या है


सुर, संगीत, थाट और राग क्या है
संगीत, थाट और राग परिचय

संगीत किसे कहते हैं?

शास्त्रों मे कहा गया है कि माँ सरस्वती ने अपनी वीणा से जो नाद छेड़ा था वह सृष्टि के कण-कण में समाहित हो गया है | वह नाद भांति-भांति की आवाज बन प्रकृति के हर गतिविधि मे भर गया है | चाहे वो बादल के गरजने की हो, झरने से गिरते पानी की हो, हवा की हो, हर वो आवाज जो सुनने मे मधुर लगती हो, दिल को छू लेती हो, बार-बार सुनने को जी करता हो, बेशक इसी मधुर आवाज को, ध्वनि को संगीत कहते है |

संगीत को और भी मधुर और रंगीन बनाने के लिए हम कई तरह के ध्वनियों को एक सुर मे संयोजित करते है जैसे किसी एक माला मे कई तरह के फूलो को कई तरह से हम पिरो सकते है और इन कई तरीको मे से कुछ तो बहुत ज्यादा ही सुंदर लगता है | जिसे देखकर हर कोई मुग्ध हो जाता है | तो संगीत भी इसी माला की तरह है | जिसे अगर सही तरीके से संयोजित करके पिरोया जाये तो यह हर किसी को मुग्ध कर सकता है और आत्मा को परम अनुभूति दिलाता है | तो आईये अब हम ये जानते है संगीत मे किस तरह के फूलो को किस तरीके से पिरोया जाता है |

सुर किसे कहते हैं?

संगीत मे सात फूल होते है जिसे भिन्न-भिन्न तरीके से भिन्न-भिन्न रूपो मे एक सुर मे, एक सूत्र मे पिरोया जाता है | उन सातों फूलो का नाम इस प्रकार है -

सा, रे, ग, म, प, ध, नि

इन्ही सात फूलों को संगीत मे सुर कहते है |

इन्ही सुरों को अलग-अलग वाद्य-यंत्रों मे बजाया जाता है | उन वाद्य-यंत्रो को बजाने वाले को वादक कहते है | इन्ही सुरों का अभ्यास करके कोई अच्छा गा सकता है | इन्ही गाने वाले को गायक कहते है |

हर आवाज जो सुनने में मधुर लगती है उसे संगीत की श्रेणी में रख सकते हैं. आपने यदि देखा हो तो अक्सर माचिस की डिब्बी बजाकर भजन गाते हुए लोग भीख मांगते हैं. मिटटी का मटका बजाकर लोग गाने की संगत करते हैं. राहुल देव बर्मन ने अपने संगीत में ऐसी बहुत सी चीजों का प्रयोग किया था. गिरते हुए झरने , बरसात , ट्रेन की सीटी, बादलों की गरज, हर प्राकृतिक आवाज का उचित तरह से संयोजन करके संगीत के सुरों में पिरोया जा सकता है. वैसे संगीत में प्रयुक्त होने वाले वाद्यों को दो श्रेणियों में बांटा गया है. सुर वाले वाद्य जैसे गिटार, हारमोनियम, बांसुरी, सितार आदि. ताल वाले वाद्यों में तबला, ढोलक, ड्रम, पैड आदि आते हैं.

थाट किसे कहते हैं?

थाट (ठाठ) स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिनसे रागों की उत्पत्ति हो सके। नाद से स्वर, स्वरों से सप्तक और सप्तक से थाट बनते हैं। उत्तर भारतीय संगीत में निम्नलिखित १० प्रमुख थाट होते हैं।

  1. बिलावल
  2. बिलावल थाट मे सभी स्वर शुद्ध लगते है -

    सा, रे, ग, म, प, ध, नि

  3. (यमन/कल्याण)
  4. यमन थाट मे म तीव्र स्वर लगते है -

    सा, रे, ग, म॑, प ध, नि

  5. खमाज
  6. खमाज थाट मे नि कोमल स्वर लगते है -

    सा, रे ग, म, प ध, नि॒

  7. भैरव
  8. भैरव थाट मे रे और ध कोमल स्वर लगते है -

    सा, रे॒, ग, म, प, ध॒ नि

  9. पूर्वी
  10. पूर्वी थाट मे रे कोमल, म तीव्र और ध कोमल स्वर लगते है -

    सा, रे॒, ग, म॑, प ध॒, नि

  11. मारवा
  12. मारवा थाट मे रे कोमल और म तीव्र स्वर लगते है -

    सा, रे॒, ग, म॑, प, ध नि

  13. काफ़ी
  14. काफी थाट मे ग नि दोनों कोमल स्वर लगते है -

    सा, रे, ग॒, म, प, ध, नि॒

  15. आसावरी
  16. आसावरी थाट मे ग ध नि सब कोमल स्वर लगते है -

    सा, रे, ग॒, म, प ध॒, नि॒

  17. भैरवी
  18. भैरवी थाट मे रे ग ध नी सब कोमल स्वर लगते है -

    सा, रे॒, ग॒, म, प ध॒, नि॒

  19. तोड़ी
  20. तोड़ी थाट मे रे ग ध कोमल तथा म तीव्र स्वर लगते है -

    सा, रे॒, ग॒, म॑, प, ध॒, नि

इन 10 थाट से ही समस्त रागों की उत्पत्ति होती है।

इनमें "बिलावल" पूर्ण शुद्ध थाट व सभी विकृत स्वरों वाला थाट उपरोक्त थाटों में से कोई नहीं है।

सभी राग ३२ थाटों के अन्तर्गत आते हैं यदि विकृत स्वरों के अनुसार थाट का निर्धारण करते हैं। विकृत स्वर अपवाद स्वरूप होते हैं व उनकी प्राथमिकता शुद्ध स्वरों से सदैव अधिक होती है।/ थाट सदैव सात स्वरों से बनते हैं, ये सात स्वर १२ स्वरों (सभी सामान्य, कोमल व तीव्र स्वर) में से कोई भी सात (स, "रे"/"रे॒", "ग"/"ग॒", "म"/"म॑, प , "ध"/"ध॒, "नि"/"नि॒, स) हो सकते हैं पर सा, रे, ग, म, प, ध, नि, इसी क्रम में होंगें (ये स्वर सामान्य, कोमल अथवा तीव्र में से कोई भी हो सकते हैं परन्तु एक विकृत स्वरूप (रे॒, ग॒,म॑,ध॒,नि॒) रखने वाले स्वर के दोनों में से एक ही रूप लिया जायेगा)।

थाट में केवल आरोह ही होता है अवरोह नहीं। उत्तर भारतीय (हिंदुस्तानी) संगीत में ३२ थाट (२(रे) x २(ग) x २ (म) x २(ध) x २ (नि) == ३२ थाट ) ही बनाये जा सकते हैं।

यदि किसी राग में स्वर के दोनों रूप प्रयोग में आ रहे हैं तब विकृत स्वर को प्राथमिकता देते हुए उसके थाट का निर्धारण होगा। जिस थाट में राग के सभी विकृत स्वर होंगे वही उसका थाट होगा। सभी ३२ थाटों के प्रचलित नाम नहीं हैं अतः सभी थाटों को विकृत स्वरों के आधार पर निम्नलिखित प्रकार से नाम दिये जा सकते हैं।

यदि थाट में "रे", "ग" व "नि" कोमल हैं तो थाट का नाम "विकृत_रे_ग_नि थाट" होगा। इसी प्रकार यदि किसी थाट में "रे", "ग" "ध" "नि" कोमल व "म" तीव्र है तो उस थाट का नाम "विकृत_रे_ग_म_ध_नि थाट" होगा (यहाँ स्वर क्रमानुसार् ही आयेंगे) ।

एक अन्य उदहरण लेते हैं - यदि आरोह में "नि" व अवरोह में (कोमल नि) "नि॒" लग रहा है, इस स्थिति में थाट अवरोह कोमल "नि" के अनुसार ही निर्धारित होगा भले ही कोमल "नि" आरोह में नहीं लगा है और थाट में केवल आरोह ही दिया जाता है।

यदि किसी थाट में सभी स्वर शुद्ध हैं तो उस थाट का नाम "शुद्ध थाट होगा" जो कि प्रचलित भाषा में "बिलावल" कहा जाता है।

दक्षिण भारतीय (कर्नाटक) मेँ ७२ मेल/थाट होते हैं क्योंकि दक्षिण भारतीय (कर्नाटक) मेँ १२ के स्थान पर १४ स्वर ( दो के स्थान पर तीन "रे" {रा, री, रु} /"ध" {धा, धी, धु} होते हैं। इसलिये ३(रे) x २(ग) x २ (म) x ३(ध) x २(नि) == ७२ मेल/थाट।

राग किसे कहते हैं?

'राग' शब्द संस्कृत की 'रंज्' धातु से बना है। रंज् का अर्थ है रंगना। जिस तरह एक चित्रकार तस्वीर में रंग भरकर उसे सुंदर बनाता है, उसी तरह एक संगीतकार मन और शरीर को संगीत के सुरों से रंगता हैं। रंग में रंग जाना मुहावरे का अर्थ ही है कि सब कुछ भुलाकर मगन हो जाना या लीन हो जाना। संगीत का भी यही असर होता है। जो रचना मनुष्य के मन को आनंद के रंग से रंग दे वही राग कहलाती है। या 'स्वर और वर्ण से विभूषित ध्वनि जो मनुष्य के मन का रंजन करे, राग कहलाता है'

राग के नियम

  • प्रत्येक राग में रञ्जकता अर्थात मधुरता आवश्यक है, अर्थात कानों को अच्छा लगना आवश्यक है।
  • राग में कम से कम ५ और अधिक से अधिक ७ स्वर होने चाहिए।
  • प्रत्येक राग किसी न किसी थाट से उत्पन्न माना गया है।
  • किसी भी राग में षडज अर्थात सा कभी-भी वर्जित नहीं होता, क्यूंकि यह सप्तक का आधार स्वर होता है।
  • प्रत्येक राग में म और प में से कम से कम एक स्वर अवश्य होना चाहिए। दोनों स्वर एक साथ वर्जित नहीं हो सकते।
  • यदि पंचम के साथ शुद्ध म भी वर्जित हो तो तीव्र-म अवश्य रहना चाहिए।
  • प्रत्येक राग में आरोह अवरोह, वादी-सम्वादी, पकड़, समय आदि होना चाहिए।
  • किसी भी राग में एक स्वर का दोनों रूप अर्थात शुद्ध-कोमल एक साथ नहीं प्रयोग होना चाहिए।

हर राग का अपना एक रूप, एक व्यक्तित्व होता है जो उसमें लगने वाले स्वरों और लय पर निर्भर करता है। किसी राग की जाति इस बात से निर्धारित होती हैं कि उसमें कितने स्वर हैं। आरोह का अर्थ है चढना और अवरोह का उतरना। संगीत में स्वरों को क्रम उनकी ऊँचाई-निचाई के आधार पर तय किया गया है। ‘सा’ से ऊँची ध्वनि ‘रे’ की, ‘रे’ से ऊ ँची ध्वनि ‘ग’ की, ग’ से ऊँची ध्वनि ‘म’ की, ‘म’ से ऊँची ध्वनि ‘प’ की, प’ से ऊँची ध्वनि ‘ध’ की, और ‘ध’ से ऊँची ध्वनि ‘नि’ की होती है। जिस तरह हम एक के बाद एक सीढ़ियाँ चढ़ते हुए किसी मकान की ऊपरी मंजिल तक पहुँचते हैं उसी तरह गायक सा-रे-ग-म-प-ध-नि-सां का सफर तय करते हैं। इसी को आरोह कहते हैं। इसके विपरीत ऊपर से नीचे आने को अवरोह कहते हैं। तब स्वरों का क्रम ऊँची ध्वनि से नीची ध्वनि की ओर होता है जैसे सां-नि-ध-प-म-ग-रे-सा। आरोह-अवरोह में सातों स्वर होने पर राग ‘सम्पूर्ण जाति’ का कहलाता है। पाँच स्वर लगने पर राग ‘औडव’ और छह स्वर लगने पर ‘षाडव’ राग कहलाता है। यदि आरोह में सात और अवरोह में पाँच स्वर हैं तो राग ‘सम्पूर्ण औडव’ कहलाएगा। इस तरह कुल 9 जातियाँ तैयार हो सकती हैं जिन्हें राग की उपजातियाँ भी कहते हैं। साधारण गणित के हिसाब से देखें तो एक ‘थाट’ के सात स्वरों में 484 राग तैयार हो सकते हैं। लेकिन कुल मिलाकर कोई डे़ढ़ सौ राग ही प्रचलित हैं। मामला बहुत पेचीदा लगता है लेकिन यह केवल साधारण गणित की बात है। आरोह में 7 और अवरोह में भी 7 स्वर होने पर ‘सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति’ बनती है जिससे केवल एक ही राग बन सकता है। वहीं आरोह में 7 और अवरोग में 6 स्वर होने पर ‘सम्पूर्ण षाडव जाति’ बनती है।

थाट से राग का जन्म होता है | यह राग अलग-अलग ऋतुओ और समय पर गाया-बजाया जाता है | जब राग को उसके उचित पर गाया या बजाया जाता है उसकी मधुरता और उसका प्रभाव और भी बढ जाता है | जैसे कुछ राग और उसके ऋतु इस प्रकार है

भैरव - शिशिर

हिंडोल - बसंत

दीपक - ग्रीष्म

मेघ - वर्षा

मालकौंस - शरद

श्री - हेमंत

आज हमने सुर, संगीत, थाट और राग के बारे मे चर्चा की है , उम्मीद है आपको इस ब्लॉग से बहुत कुछ जानकारी मिली होगी। अगर आपको कुछ कहना है तो आप अपनी प्रतिक्रिया के सकते है । बाकी एक एक कर रागो के बारे मे हम अगले ब्लॉग मे चर्चा करेंगे । तब तक के लिए धन्यवाद

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